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The Haryana Story | मशीनों ने छीना 'हाथ से तोड़ी' सेवइयों का स्वाद, घर के आंगन में बैठ सामूहिक रूप से सेवइयां तोड़ती थी महिलाएं, लुप्त से हो गए ये दिन

मशीनों ने छीना 'हाथ से तोड़ी' सेवइयों का स्वाद, घर के आंगन में बैठ सामूहिक रूप से सेवइयां तोड़ती थी महिलाएं, लुप्त से हो गए ये दिन

यही कारण है कि एक दूसरे के अंदर जो अपनेपन की भावना होती थी वह भी कहीं ना कहीं खत्म होती जा रही है

प्रतीकात्मक तस्वीर

शहर, गांव, गली मोहल्ले में पहले जो काम महिलाएं सामूहिक रूप से बैठकर करती थी, अब वह काम पर भी आधुनिकता का असर पड़ गया है। अब हाथों से बनाई (तोड़ी) गई सेवइयों की जगह मशीनों ने ले ली है और इसी वजह से आज पुराने तरीके से काम करने के मामले में लोग आलसी होते जा रहे हैं। यही कारण है कि एक दूसरे के अंदर जो अपनेपन की भावना होती थी वह भी कहीं ना कहीं खत्म होती जा रही है, पहले महिलाएं आटा, सूजी और मैदा से अलग-अलग तरीके का आटा गूंथकर सेवइयां तोड़ती थी और सब सा पड़ोस की महिलाएं किसी एक के ही घर के आँगन में बैठ जाया करती थी। अपनी-अपनी सेवइयां तोड़ने के साथ-साथ एक दूसरे की सेवइयां तुड़ाने में भी मदद करती थी। बता दें की हरियाणा में सेवइयां बनाने को सेवइयां तोड़ना या बांटना भी कहते हैं।

सामूहिक रूप से सेवइयां बनाने (तोड़ने) के काम करने में महिलाओं का आपसी प्रेम बढ़ता था

गौरतलब है कि अब से कुछ साल पहले तक भी महिलाएं अपना घर का काम निपटा कर सामूहिक रूप से इकट्ठा बैठती थी और जब वह इकट्ठा बैठती थी तो विशेष तौर से गर्मियों के मौसम में सेवइयां बनाने का काम किया जाता था, यानी सामूहिक रूप से सेवइयां बनाने (तोड़ने) के काम करने में महिलाओं का आपसी प्रेम बढ़ता था और वह घर परिवार और समाज के बारे में भी अच्छी चर्चा करती रहती थी।

विशेष तौर से सेवइयां बनाने का काम गांव में किया जाता था, हालांकि शहर में भी किया जाता है, लेकिन ज्यादा तो गांव की महिलाएं आपस में बैठकर इस कार्य को करती थी। हाथ से भी कई तरह की वैरायटी सेवइयां तोड़ी जाती थी और इनका खाने का स्वाद ही अलग हुआ करता था। सेवइयों की खीर बनाने केलिए अलग हिसाब की, घी में बनाने के लिए अलग हिसाब की और नमकीन सेवइयां बनाने के लिए अलग तरह से सेवइयों को तोड़ा अथवा बनाया जाता था। 

आज वो वैसा माहौल देखने को नहीं मिलता

लेकिन आज वो दिन, वैसा माहौल देखने को नहीं मिलता। आजकल लोग या तो बाजार से ही सेवइयों के पैकेट्स खरीद लेते हैं या फिर खुद का आटा देकर मशीनों से बनवा लेते है। कई सालों से चलती फिरती मशीनें शहरों, गांव-गली और मोहल्ले में घूमती रहती हैं। हरियाणा, पंजाब में ऐसे बहुत से लोग है जिन्होंने घर-घर जाकर सेवइयां बनाने का काम शुरू किया हुआ है और इन दिनों सक्रिय रूप से सेवइयां तोड़ने/बनाने का काम मशीनों से कर रहे हैं। अब सामूहिक रूप से बैठकर सेवइयां बनाने का महिलाओं का काम भी मशीनों ने ले लिया है।

30 रुपए और 70 रुपए किलो के हिसाब से सेवइयां बना कर देने का काम कर रहा काला राम

बताते हैं पंजाब के ऐसे ही युवक के बारे में जो मशीन लेकर गांव-गांव जाकर ये काम करता है। पंजाब राज्य के जिला फतेहगढ़ साहब के सरहन्द शहर के बीबीपुर गांव से काला राम अपने एक साथी के साथ सेवइयां बनाने की मशीन लेकर गांव-गांव में घूमता है और वह कई सालों से इस काम को कर रहा है। गली-गली और घर-घर जाकर वह सेवइयां बनाने का काम करता है। जिस परिवार ने भी सेवइयां बनवानी है अगर वह अपना आटा देगा और 30 रुपए किलो के हिसाब से वह अपनी मजदूरी लेगा और अगर कोई परिवार उसको कहे कि वह आटा भी खुद लगाएं और हमारे को सेवइयां बना कर दे तो वह 70 रुपए किलो के हिसाब से सेवइयां बना कर देने का काम कर रहा है। 

मजदूरी के हिसाब से हरियाणा मेरे लिए बहुत ही अच्छा : काला राम

कुल मिलाकर सेवइयां बनाने का काम करने वाले पंजाब के इस युवक को हरियाणा में मजदूरी करने का मौका मिल रहा है, तो वह इस कार्य से खुश है। उसने बताया कि वह जून के महीने में समालखा में आता है और अगस्त और सितंबर महीने में यहां सेवइयां बनाने का काम खत्म करके वापस अपने गांव को लौट जाता है। काला राम ने यह भी बताया कि लोगों का मुझे बड़ा प्यार मिलता है और जिस तरह से लोग सेवइयां बनाने का काम करवाते हैं निश्चित रूप से उससे मेरे को अच्छी मजदूरी मिल जाती है, और जिससे मेरा घर का चूल्हा चलता है, कुल मिलाकर उसने कहा कि मजदूरी के हिसाब से हरियाणा मेरे लिए बहुत ही अच्छा है।

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