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The Haryana Story | उमरवास की नूपुर राष्ट्रपति मुर्मु द्वारा सम्मानित, गांव में खेल सुविधा के नाम पर एक ईंच जमीन या खेल उपकरण भी नहीं

उमरवास की नूपुर राष्ट्रपति मुर्मु द्वारा सम्मानित, गांव में खेल सुविधा के नाम पर एक ईंच जमीन या खेल उपकरण भी नहीं

नूपुर श्योराण जैसी अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी में रजत पदक कर देश का सीना गर्व से चौड़ा कर रही है, लेकिन सरकार उनके पैतृक गांव को खेल सुविधा देने के नाम पर कुंभकर्णी नींद सो रही

नाममात्र सुविधा के बिना भी किसी भी गांव की मिट्टी में अभ्यास करके देश का नाम रोशन करने वाले हरियाणा के चरखी दादरी जिले, और बाढड़ा तहसील के गांव उमरवास को आज भी खेल सुविधा के नाम पर एक ईंच जमीन या खेल उपकरण उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। 1966 से स्वर्ण पदक से शुररुआत करने वाले द्रोणाचार्य अवार्डी कैप्टन हवासिंह की नुपुर श्योराण के रुप में तीसरी पीढी भले ही अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी में रजत पदक कर देश का सीना गर्व से चौड़ा कर रही हे लेकिन सरकार उनके पैतृक गांव को खेल सुविधा देने के नाम पर कुंभकर्णी नींद सो रही है। गांव की बेटी को महामहिम राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु द्वारा सम्मानित होने से गांव के ग्रामीणों व क्षेत्र के जिससे खेल प्रेमियों में खुशी का माहौल बना हुआ है।

गांव उमरवास के पास सड़क, बिजली, पानी तक उपलब्ध नहीं था

आजादी के बाद इस रेतील क्षेत्र के गांव उमरवास के पास सड़क, बिजली पानी तक उपलब्ध नहीं था, उस समय खेतों में अभ्यास करने वाले हवासिंह श्योराण ने वर्ष 1956 में भारतीय सेना में सिपाही के पद पर भर्ती हुए तथा कुछ समय बाद ही एशियाई गेम्स में भारतीय टीम भेजने की जानकारी मिली तो सेना ने मात्र चार सप्ताह के प्रशिक्षण के बाद अपनी तरफ से सिपाही हवासिंह को भेजा। सेना अधिकारियों ने उनको केवल भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करने की जिम्मेवारी सौंपी थी लेकिन उन्होंने उस समय के नामी बॉक्सर को एक ही झटके में मात दे दी और उसके बाद के तीन राऊंड में उनको मौका ही नहीं तो खेल कमेटी ने उनको स्वर्ण पदक जीत का विजेता घोषित किया तो उस समय के रेडियो में ज्योंही यह जानकारी पहुंची तो सारा राष्ट्र झूम उठा और उसके बाद सेना ने उनको पूरी तरह मुक्केबाजी का खेल में ही चयनित कर दिया जिसके बाद वह लगातार अन्य खेल स्पधार्ओं में अग्रणी रहे और 1970 के गोल्ड मैडल विजेता बनने पर सेना ने नियमों को बदल कर कैप्टन की रैंक देकर पुरस्कृत किया।

नुपुर श्योराण लगातार राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन कर रही

वर्ष 1980 तक उनको अर्जुन अवार्ड व 2000 में गुरु द्रोणाचार्य अवार्ड से नवाजा वहीं उनके पुत्र संजय श्योराण भी हरियाणा के नामचीन मुक्केबाज बनकर भीम अवार्ड हासिल करने के बाद अब उनकी पुत्री नुपुर श्योराण लगातार राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन कर रही है वहीं मौजूदा समय में आयोजित विश्व मुक्केबाजी स्पर्धा में रजत पदक जीत कर नया इतिहास रचा है। देश की झोली में अनेक पदक लाने वाली तीन पीढियों के ऐतिहासिक प्रदर्शन के बावजूद उनके पैतृक गांव उमरवास में कबड्डी, कुश्ती, मुक्केबाजी के खिलाड़ी तो हैं लेकिन खेल का मैदान या अन्य सुविधा नहीं होने से युवा खिलाड़ियों को दस किलोमीटर दूरी पर कालुवाला के नीरज चौधरी खेल स्टेडियम में जाना पड़ रहा है।

गांव के खिलाड़ियों को सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही

पूर्व सरपंच विजय मोटू, जयभगवान उमरवास, सेना के सूबेदार नरेन्द्र श्योराण ने बताया कि गांव में चकबंदी न होने से गांव के युवाओं को खेल सुविधा या ग्रामीण विकास के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है इसी गांव के हिंद केसरी अमृत पहलवान भी गांव में खेल सुविधाएं न मिलने से भावुक नजर आते हैं। गांव के सरपंच सूबेदार रामचंद्र उमरवास ने कहा कि चकबंदी न होने से वास्तव में गांव के खिलाड़ियों को सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। गांव में जल्द ही चकबंदी होने के बाद सरकार से खेल स्टेडियम व अन्य मांगे प्रमुखता से उठाकर पूरी करवाने का प्रयास है। 

नूपुर श्योराण ने अंतरराष्ट्रीय स्तर जिले का एक फिर नाम रोशन कर इतिहास रचा

हरियाणा के चरखी दादरी जिला लगातार खेलों की दुनिया में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। नूपुर श्योराण ने अंतरराष्ट्रीय स्तर जिले का एक फिर नाम रोशन कर इतिहास रचा है। गांव-गांव में खेलों की परंपरा, घर-घर में खिलाड़ियों की मौजूदगी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमकते नामों के चलते यह जिला अब देश की खिलाड़ियों की नर्सरी के रूप में जाना जा रहा है। युवा कल्याण संगठन सरंक्षक कमल प्रधान भिवानी ने राज्य सरकार से भिवानी व चरखी दादरी में एक खेल विश्वविद्यालय स्थापित करने की पुरजोर मांग की है। उनका कहना है कि यह जिला वर्षों से देश को कुश्ती, बॉक्सिंग, एथलेटिक्स, शूटिंग, हॉकी और कबड्डी जैसे खेलों में शीर्ष स्तर के खिलाड़ी देता आ रहा है, लेकिन अब भी यहां बुनियादी संसाधनों की भारी कमी है। 

चरखी दादरी के खिलाड़ी आज भी अन्य जिलों या राज्यों में प्रशिक्षण लेने को मजबूर

छात्र नेता विजय मोटू व शिक्षा प्रेरक संघ के प्रदेशाध्यक्ष मास्टर विनोद मांढी ने कहा कि चरखी दादरी के अनेक खिलाड़ी आज भी संसाधनों की कमी के कारण अन्य जिलों या राज्यों में प्रशिक्षण लेने को मजबूर हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं यहीं उपलब्ध हों, तो यह क्षेत्र ओलंपिक पदकों का पावरहाउस बन सकता है। उन्होंने कहा कि महादेव बलाली जैसे सामाजिक कार्यकर्ता अपने स्तर पर लगातार प्रयास कर रहे हैं, लेकिन सरकार यदि इस दिशा में ठोस कदम उठाए तो परिणाम और भी प्रभावशाली होंगे। बलाली की इस मांग को अब स्थानीय जनता, पूर्व खिलाड़ी, कोच और जनप्रतिनिधियों का भी समर्थन मिलने लगा है। सोशल मीडिया से लेकर गांव की चौपालों तक अब खेल यूनिवर्सिटी की चर्चा गर्म है। 

भारतीय मुक्केबाजी के एक दिग्गज थे कैप्टन हवा सिंह

कैप्टन हवा सिंह भारतीय मुक्केबाजी के एक दिग्गज थे, जो 1961 से 1972 तक लगातार 11 बार राष्ट्रीय चैंपियनशिप जीतकर एक अद्वितीय रिकॉर्ड बनाने के बाद 1966 और 1970 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीते। उन्होंने भारतीय सेना में अपने करियर की शुरूआत की और 1980 में खेल से संन्यास लेने के बाद भिवानी बॉक्सिंग क्लब की स्थापना की, जिससे भिवानी बॉक्सिंग का पावरहाउस बन गया। उन्हें अर्जुन पुरस्कार और द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया था, और उन्हें भारत के बॉक्सिंग के पितामह के रूप में याद किया जाता है।

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