भारत सरकार द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म पुरस्कार 2026 की सूची में हरियाणा के पानीपत निवासी खेम राज सुंद्रियाल का नाम पद्मश्री के लिए शामिल किया गया है। यह प्रतिष्ठित सम्मान उन्हें हथकरघा बुनाई के क्षेत्र में 60 वर्षों से अधिक के असाधारण योगदान के लिए प्रदान किया जा रहा है। विशेष रूप से जामदानी और टेपेस्ट्री तकनीकों के संरक्षण, नवाचार तथा हजारों बुनकरों को प्रशिक्षण देकर रोजगार सृजन में उनके महत्वपूर्ण कार्य को मान्यता दी गई है। खेमराज सुंद्रियाल को पद्मश्री सम्मान के लिए चुना जाने पर ना केवल हरियाणा के पानीपत बल्कि उनके उत्तराखंड के गांव सुमाड़ी में भी जश्न का माहौल है। उल्लेखनीय है कि हरियाणा के पानीपत के हैंडलूम को विदेशों तक पहुंचाने के श्रेय 84 साल के बुनकर खेमराज सुंदरियाल को ही जाता है।
जीजीएफ से उनका 30 वर्षों का जुड़ाव रहा
इस उपलब्धि पर गांधी ग्लोबल फैमिली (जीजीएफ) के महासचिव राम मोहन राय, नरेंद्र ऋषि, इंडियन एसोसिएशन ऑफ लॉयर्स के प्रांतीय उपाध्यक्ष पवन कुमार सैनी तथा कौमी एकता मंच के संयोजक संजय कुमार सहित अन्य सदस्यों ने उनके निवास पर पहुंचकर हार्दिक बधाई दी। जीजीएफ से उनका 30 वर्षों का जुड़ाव रहा है। संगठन ने इसे उनके अथक परिश्रम, नवाचार और सामाजिक योगदान की सार्थक मान्यता बताया। बता दें कि इससे पहले भी खेमराज सुंद्रियाल को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल में राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। अब पद्मश्री सम्मान की घोषणा से न केवल उनका परिवार बल्कि पूरा सुमाड़ी गांव और जनपद पौड़ी गढ़वाल और पानीपत गौरवान्वित महसूस कर रहा है।
1966 में वीवर्स सर्विस सेंटर (कपड़ा मंत्रालय) में शामिल होने के बाद वे पानीपत पहुंचे
सुंद्रियाल ने 1943, उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के सुमाड़ी गांव) ने एक साधारण किसान परिवार में जन्म लिया, लेकिन खेती के बजाय बुनाई को अपना जीवन मिशन बनाया। उन्होंने 1962-64 में श्रीनगर गढ़वाल के सरकारी आईटीआई से हैंडलूम टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा पूरा किया। 1966 में वीवर्स सर्विस सेंटर (कपड़ा मंत्रालय) में शामिल होने के बाद वे पानीपत पहुंचे, जहां उन्होंने विभाजन के बाद आए प्रवासी बुनकरों के साथ काम किया। 1966 में वे पानीपत (हरियाणा) आए और यहाँ उन्होंने पारंपरिक खेस बुनाई में नए प्रयोग शुरू किए। खेमराज ने पारंपरिक खेस को बेडशीट, बेड कवर और आधुनिक उत्पादों में बदलकर उसके बाजार को व्यापक बनाया और यह सुनिश्चित किया कि ये उत्पाद सिर्फ देश में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में मान्यता पाएं।
पानीपत को एक वैश्विक हैंडलूम हब के रूप में स्थापित किया
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में जमदानी कला को ऊनी शॉल और टैपेस्ट्री पर लागू करना शामिल है, जिससे उन वस्तुओं की सुंदरता और गुणवत्ता दोनों में वृद्धि हुई। खेमराज ने लूम तकनीक में सुधार किया, निरंतर प्रशिक्षण देकर हजारों कारीगरों को कुशल बनाया और पानीपत को एक वैश्विक हैंडलूम हब के रूप में स्थापित किया। इस समर्पण ने उन्हें हैंडलूम के क्षेत्र में अग्रणी हस्ती बना दिया। उनकी छह दशकों से अधिक की साधना और कला के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया है, जो देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
पानीपत का हथकरघा उद्योग निर्यात हब बन गया
पानीपत में आने पर उन्होंने स्थानीय बुनकरों को केवल साधारण खेस, बेडशीट और पर्दे बनाने से आगे बढ़ाया। जामदानी और टेपेस्ट्री तकनीकों को पुनर्जीवित किया, पॉलिएस्टर यार्न का उपयोग शुरू किया, रंगाई में सुधार लाए और नए डिजाइन विकसित किए। इससे पानीपत का हथकरघा उद्योग निर्यात हब बन गया। उन्होंने हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों के हजारों अप्रशिक्षित बुनकरों को प्रशिक्षित किया। सेवानिवृत्ति के बाद स्थापित सहकारी समिति आज भी 25 से अधिक बुनकरों को वार्षिक प्रशिक्षण और रोजगार दे रही है, जिससे कुल 1000 से अधिक परिवार लाभान्वित हुए हैं।
खेमराज सुंदरियाल ने लंबे समय तक खड्डी चलाई
खेमराज सुंदरियाल ने लंबे समय तक खड्डी चलाई। ग्रामीण इलाकों में 'खड्डी' उस मशीन या लकड़ी के ढांचे को कहते हैं, जिस पर सूती या रेशमी धागों से कपड़ा बुना जाता है। इसके बाद वे टेक्सटाइल इंडस्ट्री से जुड़े और फिर कुछ ऐसे डिजाइन तैयार किए जो देश ही नहीं बल्कि विदेशों में काफी ज्यादा मशहूर हुए। उन्होंने इस दौरान स्थानीय बुनकरों को प्रशिक्षण देना शुरू किया और उनकी कला को एक नया आसमान मुहैया कराया। खेमराज सुंदरियाल ने हजारों लोगों को हैंडलूम की ट्रेनिंग दी और भारतीय हस्तशिल्प को विश्व पटल पर पहचान दिलाई। साथ ही हजारों लोगों को रोजगार का साधन मुहैया कराया।
हस्तियों की पेंटिंग्स को टेपेस्ट्री में उतारा और पानीपत खेस को नए रूप दिए
उन्होंने एम.एफ. हुसैन जैसी हस्तियों की पेंटिंग्स को टेपेस्ट्री में उतारा और पानीपत खेस को नए रूप दिए। उनका मानना है, "कार्य ही सबसे बड़ा धर्म है।" इस सम्मान से पानीपत के 700 वर्ष पुराने हथकरघा उद्योग के उन सभी बुनकरों को भी श्रद्धांजलि दी गई है जिनकी मेहनत ने इस शहर को विश्व पटल पर स्थापित किया। सुंदरियाल का यह सम्मान न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि पारंपरिक हस्तशिल्प को जीवित रखने और ग्रामीण रोजगार सृजन के प्रेरक उदाहरण के रूप में उभरेगा। हम उन्हें पुनः हार्दिक बधाई देते हैं और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।