हरियाणा के झज्जर जिले का बाढ़सा गांव इन दिनों प्रदेश की राजनीति में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यहाँ 10 मई को होने वाले सरपंच उपचुनाव में एक ही परिवार के चार सदस्य तीन सगे भाई और उनके सगे चाचा एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी ताल ठोक रहे हैं, जिस वजह इस उपचुनाव ने खासा रोचक मोड़ ले लिया है। दरअसल, गांव के पूर्व सरपंच ज्ञानचंद के निधन के बाद यह उपचुनाव कराया जा रहा है। उनकी राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए अब उनके तीनों बेटों ने चुनावी मैदान में उतरकर ताल ठोक दी है। वहीं, इस मुकाबले को और पेचीदा बनाते हुए ज्ञानचंद के सगे भाई ने भी नामांकन दाखिल कर दिया है।
विरासत संभालने की होड़: सगे भाइयों में मुकाबला
पूर्व सरपंच ज्ञानचंद के निधन के बाद खाली हुई इस कुर्सी को पाने के लिए उनके तीनों बेटे दीपक (45), रमेश (43) और मनोज (40) मैदान में हैं। तीनों भाई अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने के नाम पर गांव वालों से वोट मांग रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि तीनों भाई अपने पिता ज्ञानचंद के नाम और उनके द्वारा किए गए कार्यों का हवाला देकर जनता का समर्थन जुटाने में लगे हैं, चाचा भी मैदान में: परिवार की
आपसी खींचतान आई सामने
इस चुनावी घमासान में नया मोड़ तब आया जब ज्ञानचंद के छोटे भाई और सगे चाचा बाल किशन ने भी अपना नामांकन पत्र भर दिया। चाचा का कहना है कि शुरुआत में परिवार ने भाई की विरासत संभालने के लिए उनका समर्थन किया था, लेकिन अब उनके भतीजे भी मैदान में उतर आए हैं, जिससे मुकाबला और भी उलझ गया है।
चुनावी समीकरण और प्रमुख दावेदार
गांव में करीब 3,450 मतदाता हैं और इस उपचुनाव में कुल 9 उम्मीदवार मैदान में हैं, जिनमें ज्ञानचंद के परिवार के अलावा कार्यवाहक सरपंच संदीप, जगबीर, सतबीर और रविंद्र जैसे नाम शामिल हैं। वहीं कार्यवाहक सरपंच संदीप का कहना है कि उन्होंने अपने छोटे से कार्यकाल में गांव का काफी विकास कराया है और वे केवल 'नाम' के सहारे नहीं बल्कि अपने 'काम' के दम पर वोट मांग रहे हैं।
गांव में चर्चा का विषय
बाढ़सा गांव में अब बहस इस बात पर छिड़ी है कि ग्रामीण 'विरासत' को चुनेंगे या 'विकास' को। एक ही परिवार के चार सदस्यों के मैदान में होने से वोटों के बंटवारे का खतरा भी मंडरा रहा है, जिससे अन्य निर्दलीय उम्मीदवारों की उम्मीदें बढ़ गई हैं। इस अनोखे चुनावी दंगल ने न केवल गांव बल्कि पूरे जिले का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है, जहाँ रिश्तों की डोर चुनावी महत्वाकांक्षाओं के आगे कमजोर पड़ती दिख रही है।
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