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The Haryana Story | विरासत में पानी या रेगिस्तान? हरियाणा के 91 'ओवर-एक्सप्लॉइटेड' ब्लॉकों को फिर से हरा-भरा बनाने की चुनौती

विरासत में पानी या रेगिस्तान? हरियाणा के 91 'ओवर-एक्सप्लॉइटेड' ब्लॉकों को फिर से हरा-भरा बनाने की चुनौती

यह संकट केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि हरियाणा की आर्थिक रीढ़ खेती' के अस्तित्व का है...

हरियाणा के कई जिलों में आज ट्यूबवेल जवाब दे रहे हैं। जहाँ कभी 20-30 फीट पर पानी मिल जाता था, आज वहां 200 फीट से नीचे भी बोरिंग सूखी निकल रही है। मई 2026 तक के ताजा आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश का औसत भूजल स्तर अब 23.02 मीटर तक गिर चुका है। यह संकट केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि हरियाणा की आर्थिक रीढ़ खेती' के अस्तित्व का है। 'डार्क जोन' उन इलाकों या ब्लॉकों को कहा जाता है जहाँ भूजल का दोहन, उसके पुनर्भरण की तुलना में बहुत अधिक होता है। आसान शब्दों में, जितना पानी बारिश या अन्य स्रोतों से ज़मीन के नीचे वापस जा रहा है, उससे कहीं ज़्यादा मशीनों और ट्यूबवेलों द्वारा बाहर निकाला जा रहा है।

करनाल जिले के सभी ब्लॉक डार्क जोन में

भारत सरकार का केंद्रीय भूजल बोर्ड और हरियाणा सरकार अब 'डार्क जोन' की जगह 'ओवर-एक्सप्लॉइटेड' शब्द का उपयोग करते हैं। जब भूजल निकासी की दर 100% से अधिक हो जाती है। इसका मतलब है कि इलाके का 'वॉटर बैंक अकाउंट' घाटे में है।

क्रिटिकल : जहाँ दोहन 90% से 100% के बीच हो।

सेमी-क्रिटिकल : जहाँ दोहन 70% से 90% के बीच हो।

सुरक्षित : जहाँ दोहन 70% से कम हो। पहले इसको तीन कैटेगरी में बांटा गया था ग्रे जॉन ग्रीन जोन और डार्क जोन लेकिन अब इसका नाम बदलकर सुरक्षित, सेमी क्रिटिकल, क्रिटिकल और डार्क जोन कर दिया गया था। डार्क जोन को ओवर-एक्सप्लॉइटेड कहा जाता है। करनाल जिले के सभी ब्लॉक करनाल, इंद्री, नीलोखेड़ी, निसिंग, असंध, घरौंडा, कुंजपुरा और मुनक डार्क जोन में आ गए हैं।

करनाल के सभी ब्लॉक के भूमिगत वाटर लेवल टेबल

पिछले 50 वर्ष का भूमिगत वाटर लेवल करनाल जिले का जून 1974 से जून 2025 तक इस प्रकार है- करनाल जिले के करनाल ब्लॉक में 1974 में भूमिगत वाटर लेवल 8.23 था जो जून 2025 में 16.32 मीटर हो गया है। इसी प्रकार घरौंडा ब्लॉक के  5.80 से 23.77 मीटर पर हो गया है। नीलोखेड़ी ब्लॉक में 6. 81 से 27.29 मीटर हो गया है। असंध ब्लॉक में 5.36 से 28.41 मीटर हो गया है। निसिंग ब्लॉक में 5.23 से 29.03 मीटर हो गया है। इंद्री ब्लॉक में 8.49 से 12.45 मीटर हो गया है।कुंजपुरा ब्लॉक में 5.23 से 9.69 मीटर हो गया है। मुनक ब्लॉक में 4.38  से 20.84 मीटर हो गया है। जिले में 1974 में भूमिगत वाटर लेवल की एवरेज 6.19 से अब 20.98 मीटर हो गई है।

औद्योगिक और शहरी विकास की अनकही कीमत

अक्सर हम गिरते जलस्तर का दोष केवल किसानों पर मढ़ देते हैं, लेकिन करनाल, पानीपत और सोनीपत जैसे औद्योगिक बेल्ट में 'डार्क जोन' बनने के पीछे बेतहाशा शहरीकरण और अनियंत्रित औद्योगिक खपत भी है। बड़े-बड़े अपार्टमेंट्स और फैक्ट्रियों में जमीन से खींचा जाने वाला पानी कभी वापस जमीन के अंदर नहीं जाता क्योंकि कंक्रीट की सड़कों ने धरती के रोम-छिद्र  बंद कर दिए हैं।

खारे पानी का 'साइलेंट किलर'

डॉ. महावीर द्वारा रेखांकित 'दोहरी चुनौती' सबसे डरावनी है। हरियाणा के दक्षिणी जिलों में जलस्तर ऊपर तो आ रहा है, लेकिन वह 'जहर' (खारा पानी) बनकर। यह खारा पानी न केवल फसलों को जला रहा है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता को हमेशा के लिए खत्म कर रहा है। यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ पानी तो है, पर वह उपयोग के लायक नहीं।

धान का मोह और गिरता पाताल

हरियाणा के 91 ब्लॉकों में भूजल दोहन की दर 100% से अधिक है। इसका सबसे बड़ा कारण 'धान-गेहूँ' का चक्र है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक किलो चावल पैदा करने के लिए लगभग 3,000 से 5,000 लीटर पानी की खपत होती है। जब तक फसल चक्र में बदलाव नहीं होगा, 'डार्क जोन' का यह काला साया कम नहीं होगा।

सरकार की 'ब्लूप्रिंट' रणनीति: 2025-26 के मुख्य कदम

संकट को देखते हुए राज्य और केंद्र सरकार ने कुछ ठोस कदम उठाए हैं:'मेरा पानी-मेरी विरासत' का विस्तार: धान छोड़कर वैकल्पिक फसलें (मक्का, कपास, दालें) उगाने वाले किसानों को दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि अब ₹7,000 से बढ़ाकर ₹8,000 प्रति एकड़ करने का प्रस्ताव है।अटल भूजल योजना 2.0: इस योजना के तहत सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया जा रहा है। गाँव की पंचायतें अब खुद तय कर रही हैं कि उनके हिस्से का कितना पानी कृषि, कितना पीने और कितना भविष्य के लिए बचाना है।

एक चेतावनी

करनाल में 1974 के 6.19 मीटर से 2025 के 21.38 मीटर तक का सफर यह बताता है कि हम कितनी तेजी से 'डेथ जोन' की तरफ बढ़ रहे हैं। यदि आज हम जागरूक नहीं हुए, तो वह दिन दूर नहीं जब हरियाणा की पहचान 'हरियाली' नहीं, बल्कि पानी के लिए खाली पड़े मटकों के साथ लंबी कतारें होंगी।

राष्ट्रीय जल डेटा नीति 202

हाल ही में लागू इस नीति के तहत हरियाणा के हर ब्लॉक में डिजिटल वॉटर मीटर और सेंसर लगाए जा रहे हैं, ताकि पानी की चोरी और बर्बादी को रियल-टाइम में ट्रैक किया जा सके। अब 'फ्लड इरिगेशन' (खेत भर देना) का समय खत्म हो चुका है। सरकार का लक्ष्य 2026 के अंत तक प्रदेश के 65,000 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर) के तहत लाना है। इससे न केवल 40% पानी की बचत होती है, बल्कि उर्वरकों का उपयोग भी कम होता है।

बोरवेल रिचार्ज अनिवार्य

हर नए ट्यूबवेल कनेक्शन के साथ 'रिचार्ज शाफ्ट' बनाना अनिवार्य होना चाहिए ताकि बारिश का पानी सीधे जमीन के अंदर जाए। झज्जर और रोहतक जैसे जिलों में जहाँ खारा पानी ऊपर आ रहा है, वहाँ डिसेलिनेशन प्लांट और मत्स्य पालन  को बढ़ावा देने की जरूरत है। हर गाँव को अपना 'वॉटर बजट' तैयार करना होगा।  हरियाणा का डार्क जोन अब एक 'रेड सिग्नल' है। यदि हमने आज अपनी सिंचाई की आदतों और फसल पैटर्न को नहीं बदला, तो आने वाली पीढ़ी को विरासत में उपजाऊ जमीन नहीं, बल्कि एक प्यासा रेगिस्तान मिलेगा। पानी की बचत अब एक विकल्प नहीं, बल्कि जीने की शर्त है।

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