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The Haryana Story | चाय की भट्टी पर तपे पिता के सपने, जब बेटे ने पढ़ाई छोड़ने की बात कही तो पिता ने ठान लिया था - 'हालात हारेंगे, बच्चे नहीं'

चाय की भट्टी पर तपे पिता के सपने, जब बेटे ने पढ़ाई छोड़ने की बात कही तो पिता ने ठान लिया था - 'हालात हारेंगे, बच्चे नहीं'

जिस बेटे को सीए बनाया वह आज एसोसिएशन का सिरमौर, 500 रुपये की नौकरी से नहीं चला घर, सड़क किनारे चाय बेचकर बच्चों को पढ़ाया

पानीपत ओल्ड डीसी रोड पर चाय की एक छोटी-सी दुकान के सामने से रोज सैकड़ों लोग गुजरते थे। बहुत कम लोग जान पाते थे कि इस दुकान की भट्टी पर सिर्फ चाय नहीं उबलती थी, बल्कि एक पिता के सपने भी तपते थे। यह कहानी है भगत राम की, जिन्होंने आर्थिक तंगी, बेरोजगारी और अभावों से लड़ते हुए अपने बच्चों के भविष्य को संवार दिया। आज जब उनका छोटा बेटा भूपेंद्र शर्मा न केवल चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) बनकर अपनी पहचान बना चुका है बल्कि जिले में सीए ब्रांच का सिरमौर यानी चेयरमैन भी बन चुका है। परिवार के अन्य बच्चे भी अपने-अपने क्षेत्र में सफल हैं, तब भगत राम का संघर्ष प्रेरणा की एक जीवंत मिसाल बन गया है।

पढ़े-लिखे थे, लेकिन नौकरी ने नहीं दिया साथ

भगत राम बताते हैं कि वे पढ़ाई में अच्छे थे और दसवीं कक्षा अच्छे अंकों से पास की थी। परिवार को उम्मीद थी कि पढ़ाई के दम पर अच्छी नौकरी मिलेगी, लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। रोजगार की तलाश में उन्होंने वर्षों तक भटककर देखा, मगर जो काम मिला उसमें 500 से 1000 रुपये मासिक से ज्यादा वेतन नहीं था। इतनी कम आय में परिवार का खर्च चलाना मुश्किल था। घर की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती गई। हालात ऐसे हो गए कि बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होने लगी।

जिस दिन बेटे ने पढ़ाई छोड़ने की बात कही..!

संघर्ष का सबसे कठिन दौर तब आया, जब बड़े बेटे ने घर की हालत देखकर पढ़ाई बीच में छोड़ने की इच्छा जताई। बेटे का दर्द देखकर भगत राम भीतर तक टूट गए। उन्हें लगा कि गरीबी उनके बच्चों के सपनों को निगल रही है। उसी दिन उन्होंने फैसला कर लिया कि चाहे उन्हें कितना भी संघर्ष करना पड़े, लेकिन बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकेगी।

एक सिलेंडर और चायपत्ती से शुरू हुआ सफर

भगत राम और उनकी पत्नी शकुंतला ने घर की बची-खुची पूंजी से सड़क किनारे चाय की छोटी-सी दुकान शुरू की। एक गैस सिलेंडर, कुछ बर्तन और चाय बनाने का सामान ही उनकी शुरुआती पूंजी थी। सुबह से देर रात तक वे दुकान पर मेहनत करते। गर्मी, सर्दी और बरसात की परवाह किए बिना चाय बनाते रहे। उनकी कमाई भले सीमित थी, लेकिन उन्होंने बच्चों की फीस और पढ़ाई के खर्च को कभी रुकने नहीं दिया। परिवार के लोगों का कहना है कि कई बार भगत राम ने अपनी जरूरतों को टाल दिया, लेकिन बच्चों की किताबें और पढ़ाई का खर्च कभी नहीं रोका।

2009 में रंग लाई तपस्या

वर्ष 2009 भगत राम के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। उनके बेटे भूपेंद्र शर्मा ने देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में मानी जाने वाली चार्टर्ड अकाउंटेंसी परीक्षा पास कर ली। यह केवल बेटे की सफलता नहीं थी, बल्कि उस पिता की जीत थी जिसने गरीबी के सामने हार मानने से इनकार कर दिया था। बेटे की उपलब्धि ने पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी। जिले में भी भूपेंद्र शर्मा की सफलता की चर्चा हुई और भगत राम का सिर गर्व से ऊंचा हो गया।

आज बच्चे हैं सफलता की नई पहचान

आज भगत राम के तीनों बेटे अपने-अपने क्षेत्रों में पहचान बना चुके हैं। उनकी पुत्री भी शिक्षित और आत्मनिर्भर जीवन जी रही है। परिवार अब उस दौर से काफी आगे निकल चुका है, जब रोजमर्रा के खर्च जुटाना भी चुनौती हुआ करता था। फिर भी भगत राम ने अपनी सादगी नहीं छोड़ी। वे आज भी अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हैं और युवाओं को शिक्षा का महत्व समझाते हैं।

सफलता का असली अर्थ समझाती है यह कहानी

भगत राम की कहानी केवल एक परिवार की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन हजारों माता-पिताओं का प्रतिनिधित्व करती है जो अपनी इच्छाओं और सुविधाओं का त्याग कर बच्चों के भविष्य को संवारते हैं। भगतराम अपने जीवन का आदर्श अपने पिता और बड़े भाई राजकुमार को बताते हैं।

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